7/23/26

उपदेश

उपदेश का अर्थ किसी को अच्छी सलाह, शिक्षा, सीख या नसीहत देना है। यह वह मार्ग-दर्शन है जो किसी गुरु, बड़े-बुजुर्ग या ज्ञानी व्यक्ति द्वारा किसी के हित और कल्याण के लिए दिया जाता है।


प्रसिद्ध नीतिवचन (कहावतें) जीवन के गहरे अनुभवों और सच्चाई को कम शब्दों में बयां करते हैं। ये हमें सही रास्ता दिखाने और जीवन की सीख देने का काम करते हैं।

प्रसिद्ध हिंदी और भारतीय लोकक्तियाँ (नीतिवचन)

अंधों में काना राजा: कम ज्ञान वाले के बीच थोड़ा ज्ञान वाला भी बड़ा माना जाता है।

अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत: समय निकल जाने के बाद पछताने से कोई फायदा नहीं होता।

कर भला तो हो भला: अच्छा काम करने वाले का हमेशा अच्छा ही होता है।

नाच न जाने आंगन टेढ़ा: खुद काम न आना और दूसरों या माहौल में कमी निकालना।

जिज्ञासा और ज्ञान: जैसी संगत, वैसी रंगत (अच्छे लोगों के साथ रहने से अच्छा असर पड़ता है)।


नीतिवचन (संस्कृत नीति श्लोक) जीवन जीने के सही तरीके, अच्छे आचरण और बुद्धिमत्ता की सीख देते हैं।


अङ्गेन गात्रं नयनेन वक्त्रं न्यायेन राज्यं लवणेन भोज्यम्।

धर्मेण हीनं खलु जीवितं च न राजते चन्द्रमसा विना निशा॥"

अर्थ: जिस प्रकार अंगों के बिना शरीर, नेत्रों (आँखों) के बिना मुख, न्याय व्यवस्था के बिना राज्य, और नमक के बिना भोजन शोभा नहीं देता (अधूरा होता है),उसी प्रकार धर्म (नैतिक मूल्यों और कर्तव्य) के बिना मानव जीवन भी शोभा नहीं देता और व्यर्थ है


वृत्तं यत्नेन संरक्षेद् वित्तमेति च याति च।

अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतः पुमान्॥

अर्थ: मनुष्य को अपने आचरण (चरित्र) की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए। धन तो आता-जाता रहता है। धन से हीन व्यक्ति क्षीण (निर्धन) नहीं होता, किंतु आचरण से हीन व्यक्ति पूरी तरह नष्ट हो जाता है।

सत्येन रक्षते धर्मो विद्या योगेन रक्षते।

मृगया रक्षते रूपं कुलं वृत्तेन रक्षते॥

अर्थ: धर्म की रक्षा सत्य से होती है, विद्या की रक्षा अभ्यास (निरंतर पठन-पाठन) से होती है, सौंदर्य की रक्षा साफ-सफाई से होती है, और कुल (वंश) की रक्षा अच्छे आचरण से होती है।

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः।

परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥

अर्थ: वृक्ष दूसरों के लिए फल देते हैं, नदियाँ दूसरों के लिए बहती हैं, गायें दूसरों के लिए दूध देती हैं; इसी प्रकार हमारा यह शरीर भी परोपकार के लिए ही है।

नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नस्ति सत्यसमं तपः।

नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्॥

अर्थ: विद्या के समान कोई (ज्ञान रूपी) नेत्र नहीं है, सत्य के समान कोई तपस्या नहीं है, मोह (आसक्ति) के जैसा कोई दुःख नहीं है, और त्याग के समान कोई सुख नहीं है।

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।

न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥

अर्थ: कार्य केवल परिश्रम करने से ही पूरे होते हैं, मन में इच्छाएं करने से नहीं। जैसे सोते हुए सिंह के मुँह में हिरण अपने आप प्रवेश नहीं करता, उसे शिकार के लिए प्रयत्न करना पड़ता है।

सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।

वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव संपदः ॥

अर्थ: बिना सोचे-समझे अचानक कोई काम नहीं करना चाहिए। विवेक की कमी बड़ी विपत्तियों का कारण बनती है। सोच-विचारकर काम करने वाले व्यक्ति को लक्ष्मी (सुख-संपत्ति) स्वयं चुन लेती है।

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।

न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ॥

अर्थ: जो माता-पिता अपने बच्चों को शिक्षा नहीं दिलाते, वे उनके शत्रु के समान हैं। अनपढ़ व्यक्ति विद्वानों की सभा में वैसे ही शोभा नहीं देता जैसे हंसों के बीच बगुला।

येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।

ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥

अर्थ: जिन लोगों के पास न विद्या है, न तप, न दान, न ज्ञान, न अच्छा स्वभाव, न गुण और न धर्म है; वे इस पृथ्वी पर भारस्वरूप हैं और मनुष्य के रूप में जानवरों की तरह घूमते हैं।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत् ॥

अर्थ: काम (वासना), क्रोध और लोभ- ये आत्मा का नाश करने वाले नरक के तीन द्वार हैं। इसलिए इन तीनों को छोड़ देना चाहिए।

प्रसिद्ध नीतिवचन और लोक-काव्य (पद) है, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं, आदतों और उनके प्रभावों को बहुत सरल और गहरे तरीके से समझाता है।


ज्ञान घटे नर मूढ़ की संगत, बुद्धि घटे चित विषय भरमाए: मूर्ख या अज्ञानी लोगों के साथ रहने से ज्ञान कम होता है। मन जब बुरी वासनाओं और विषयों में भटकता है, तो हमारी सोचने-समझने की बुद्धि कमजोर हो जाती है।

तेज घटे पर-नारी की संगत, बुद्धि घटे बहु भोजन खाये: गलत या अनैतिक संगत से व्यक्ति का तेज और चरित्र घटता है। जरूरत से ज्यादा खाना खाने से भी शरीर और बुद्धि भारी व सुस्त हो जाते हैं।

प्रेम घटे नित ही कुछ मांगत, मान घटे नित पर घर जाए: किसी से रोज-रोज चीजें या मदद मांगने से आपसी प्रेम कम होने लगता है। बिना काम या बार-बार दूसरों के घर जाने से मान-सम्मान घट जाता है।

पाप घटे हरि के गुण गाये: भगवान या ईश्वर का स्मरण करने और उनके गुण गाने से व्यक्ति के सारे पाप और दुःख नष्ट हो जाते हैं।



प्रमुख उपदेश — भगवद्गीता से


न जायते म्रियते वा कदाचिन्

नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो

न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥

— भगवद्गीता 2.20

आत्मा न कभी जन्मती है, न मरती है। यह अजन्मा, शाश्वत और अमर है। शरीर के नष्ट होने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होती।


कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

— भगवद्गीता 2.47

तुम्हारा अधिकार केवल कर्म में है, फल में कभी नहीं।


योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।

सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

— भगवद्गीता 2.48

सफलता और असफलता में समान भाव रखते हुए कर्म करो। यही समत्व योग कहलाता है।


श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।

स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥

— भगवद्गीता 3.35

अपना धर्म गुणरहित भी दूसरे के अच्छी तरह किए गए धर्म से श्रेष्ठ है।


असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥

— भगवद्गीता 6.35

निस्संदेह मन चंचल है, परन्तु अभ्यास और वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है।


पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।

तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥

— भगवद्गीता 9.26

जो कोई मुझे भक्ति से एक पत्ता, एक फूल, एक फल या जल भी अर्पित करता है — उस शुद्ध हृदय से दिया गया भक्ति का प्रसाद मैं स्वीकार करता हूँ।


यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।

तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥

— भगवद्गीता 6.30

जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है — उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए कभी अदृश्य नहीं होता।


त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥

— भगवद्गीता 16.21

काम (वासना), क्रोध और लोभ — ये तीन नरक के द्वार हैं जो आत्मा का नाश करते हैं। इसलिए इन तीनों को त्यागना चाहिए।


सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

— भगवद्गीता 18.66

सब धर्मों को त्यागकर मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।


जीवन में कई बार बहुत बुरा समय आता है। जब इंसान पूरी तरह से टूट जाता है। हर तरफ देखने पर उसे अंधेरा ही दिखता है। ना कोई साथी-संबंधी न ही कोई वस्तु उसे इस स्थिति से बाहर निकाल पाते हैं। न तो किसी चीज में उसे खुशी मिलती है और न ही कोई रास्ता नजर आता है। अगर आप भी ऐसे समय से गुजर रहे हैं या आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हो जो इस परिस्थिति में फंसा हुआ है। तो आपको भगवान श्रीकृष्ण की ओर से कहीं गईं कुछ बातों को स्मरण जरूर करना चाहिए।

1- अगर परमात्मा तुम्हें कष्ट के पास ले आया है, तो अवश्य ही वो तुम्हें कष्ट के पार भी ले जाएगा।

2- किसी भी मनुष्य की परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहती हैं। परिस्थितियां हमेशा बदलती हैं। इसलिए मनुष्य को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए।

3- जो हो रहा है उसे होने दो तुम्हारे ईश्वर ने तुम्हारी सोच से बेहतर तुम्हारे लिए सोच रखा है।

4- यदि परिस्थितियां आपके हक में नहीं है, तो विश्वास कीजिए कुछ बेहतर आपकी तलाश में है।

5- जो भी हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा है, जो भी होगा अच्छा होगा, भविष्य के बारे में चिंता मत करो। वर्तमान में जियो ।

6– निंदा से घबराकर अपने लक्ष्य को न छोड़े क्योंकि, लक्ष्य मिलते ही निंदा करने वालों की राय बदल जाती है।

7- तनाव से केवल समस्याएं जन्म ले सकती हैं, समाधान खोजने हैं तो मुस्कुराना ही पड़ेगा।

 8– इस पृथ्वी लोक पर कोई साथ नहीं देता, यहां तुम्हें खुद ही लड़ना है और खुद ही समझना भी है।

9- व्यक्ति जो चाहे बन सकता है, यदि वह विश्वास के साथ इच्छित वस्तु पर लगातार चिंतन करे।

10- व्यक्ति को खुद से बेहतर कोई नहीं जान सकता है। जो व्यक्ति अपने गुणों और कमियों को जान लेता है वह अपने व्यक्तित्व का निर्माण करके हर काम में सफलता प्राप्त कर सकता है।



गीता के सबसे लोकप्रिय और जीवन बदलने वाले मुख्य संदेशों को इन प्रमुख बिंदुओं में समझा जा सकता है: 


कर्म का अधिकार: तुम्हारा अधिकार सिर्फ कर्म करने पर है, उसके फल की इच्छा पर नहीं। 

कर्म की श्रेष्ठता: कर्म न करने से कर्म करना हमेशा बेहतर होता है।

निःस्वार्थ भाव: बिना किसी फल की आसक्ति के अपने कर्तव्यों का पालन करें। 

योगः कर्मसु कौशलम्: कार्य में कुशलता ही योग है। 

मन की स्थिति: मन ही मनुष्य का मित्र है और मन ही उसका शत्रु है।

संशय का नाश: संदेह करने वाले व्यक्ति का नाश हो जाता है, उसे न इस लोक में सुख मिलता है न परलोक में। 

क्रोध और काम: काम, क्रोध और लोभ नरक के तीन द्वार हैं जो आत्मा का पतन करते हैं।

इंद्रियों पर नियंत्रण: जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों को वश में कर लेता है, उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है।

अमर आत्मा: आत्मा न कभी जन्म लेती है और न मरती है; यह अजर और अमर है।

वस्त्र परिवर्तन: जैसे मनुष्य पुराने कपड़े उतारकर नए पहनता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है।

शोक का त्याग: जो चीजें जा चुकी हैं या जो अनिवार्य हैं, उनके लिए ज्ञानी लोग शोक नहीं करते।

परिवर्तन ही नियम: जो परिवर्तन आज हुआ है, वही इस संसार का नियम है।

वर्तमान में जीना: जीवन न तो भूतकाल में है और न भविष्य में, जीवन केवल इस वर्तमान पल में है।

सब कुछ अच्छा होता है: जो हुआ वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है वह अच्छा हो रहा है, जो होगा वह भी अच्छा ही होगा।

धर्म की स्थापना: जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब मैं (ईश्वर) इस धरा पर अवतार लेता हूँ।

पूर्ण समर्पण: सब कुछ मुझ (परमात्मा) पर छोड़कर अपने कर्तव्यों का पालन करो, मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा।

सर्वधर्मान् परित्यज्य: सभी धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ, मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा।


संस्कृत के  प्रसिद्ध नीति श्लोक उनके अर्थ सहित दिए गए हैं, जो जीवन में अच्छे आचरण और ज्ञान की सीख देते हैं:

हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कंठस्य भूषणम्।

श्रोतस्य भूषणं शास्त्रं भूषनैः किं प्रयोजनम्॥

अर्थ: हाथ का आभूषण दान है, गले का आभूषण सत्य है और कान का आभूषण शास्त्र सुनना है। फिर अन्य आभूषणों की क्या आवश्यकता है?

अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहुभाषते।

अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः॥

अर्थ: जो बिना बुलाए किसी के यहाँ जाता है, बिना पूछे बहुत बोलता है और अविश्वसनीय पर विश्वास करता है, वह मूर्ख और नीच मनुष्य कहलाता है।

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः।

षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र देवः सहायकृत्॥

अर्थ: उद्यम (परिश्रम), साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम—ये छह गुण जहाँ होते हैं, वहाँ भगवान भी सहायता करते हैं।

लोभात्क्रोधः प्रभवति लोभात्कामः प्रजायते।

लोभामोहश्च नाशश्च लोभः पापस्य कारणम्॥

अर्थ: लोभ से क्रोध पैदा होता है, लोभ से ही काम-भावना जागती है। लोभ से ही मोह और नाश होता है, अतः लोभ ही सभी पापों का कारण है।

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।

तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥

अर्थ: मीठे वचन बोलने से सभी जीव प्रसन्न होते हैं। इसलिए हमेशा प्रिय ही बोलना चाहिए, ऐसे बोलने में कंजूसी कैसी?

यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रियाः।

चित्ते वाचि क्रियायां च साधूनामेकरूपता॥

अर्थ: जैसा मन होता है वैसी ही वाणी होती है, और जैसी वाणी होती है वैसा ही कर्म होता है। सज्जनों के मन, वाणी और कर्म में एकरूपता (समानता) होती है।

विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।

पात्रत्वाद्ध धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥

अर्थ: विद्या से विनय (नम्रता) आती है, विनय से योग्यता आती है, योग्यता से धन प्राप्त होता है, धन से धर्म और धर्म से सुख मिलता है।

जलप्लावनशौचाभ्यां शरीरं शुद्धयते तथा।

मनः सत्येन शुद्धयते विद्यातपोभ्यां बुद्धिविशिष्यते॥

अर्थ: जल और मिट्टी से शरीर शुद्ध होता है, मन सत्य से पवित्र होता है और विद्या तथा तप से बुद्धि श्रेष्ठ बनती है।

नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नस्ति सत्यसमं तपः।

नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्॥

अर्थ: विद्या के समान कोई नेत्र नहीं है, सत्य के समान कोई तप नहीं है, मोह (राग) के समान कोई दुःख नहीं है और त्याग के समान कोई सुख नहीं है।

अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम्।

अधनस्य कुतो मित्रं अमित्रस्य कुतो सुखम्॥

अर्थ: आलसी को विद्या कहाँ? विद्याहीन को धन कहाँ? धनहीन को मित्र कहाँ? और मित्रहीन को सुख कहाँ मिल सकता है?

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