7/4/18

Income Tax Return in hindi



वैसे आपका पता होगा कि भारत में हर कमाई वाले शख्स को Income tax देना होगा। सिर्फ उन्ही लोगों को राहत मिली है जिनकी कमाई बेसिक छूट की सीमा से कम है। इसके ऊपर इनकम टैक्स लगता है। ये इनकम टैक्स भी चरणबद्ध तरीके से लगता है। कमाई बढ़ती जाएगी तो टैक्स का रेट भी ज्यादा हो जाएगा। दरअसल इनकम स्लैब के हिसाब से टैक्स का रेट होता है। सरकार हर साल बजट में इनकम टैक्स स्लैब रेट की समीक्षा करती है।



एक ईमानदार और ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते आपका फ़र्ज़ बनता है की आप सरकार द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करें| आपको समय पर अपने Income Tax Return (ITR) फाइल करन चाहिए| यदि किसी कारणवश अपना इनकम टैक्स रिटर्न फाइल नहीं कर पाए हैं, तो ज्यादा देर इंतज़ार न करें| अगर आप सही समय पर आयकर रिटर्न फाइल नहीं करते, तो परिणाम गंभीर हो सकते हैं|



सबसे पहले जानें कुछ बेसिक टर्म्स



इनकम टैक्स रिटर्न 

देश के हर टैक्सपेयर की यह ड्यूटी है कि वह इनकम टैक्स विभाग को हर फाइनैंशल इयर के अंत में उस फाइनैंशल इयर में हुई आमदनी का ब्योरा दे। यह ब्योरा उसे विभाग द्वारा तय फॉर्म में भरकर देना होता है। इस फॉर्म के जरिये दी गई पूरी जानकारी इनकम टैक्स रिटर्न कहलाती है।



फाइनैंशल इयर

1 अप्रैल से 31 मार्च तक के समय को फाइनैंशल इयर कहा जाता है। उदाहरण के तौर पर 1 अप्रैल 2015 से 31 मार्च 2016 तक के समय को फाइनैंशल इयर 2015-16 कहा जाएगा। अभी हम जो रिटर्न भर रहे हैं, वह फाइनैंशल इयर 2015-16 के लिए है।



असेसमेंट इयर

असेसमेंट इयर फाइनैंशल इयर से आगे वाला साल होता है यानी जिस साल उस फाइनैंशल इयर के टैक्स संबंधी मामलों का आकलन किया जाता है। मसलन फाइनैंशल इयर 2015-16 के लिए असेसमेंट इयर 2016-17 होगा क्योंकि फाइनैंशल इयर 2015-16 की जो आमदनी है, उस पर टैक्स भरा या नहीं जैसा आकलन इनकम टैक्स विभाग फाइनैंशल इयर 2016-17 में करेगा इसलिए फाइनैंशल इयर 2015-2016 के लिए असेसमेंट इयर 2016-17 होगा। अभी हम जो रिटर्न भर रहे हैं, वह फाइनैंशल इयर 2015-16 या असेसमेंट इयर 2016-17 का रिटर्न कहा जाएगा।



डिडक्शंस

विभिन्न तरह के इन्वेस्टमेंट पर इनकम टैक्स विभाग की ओर से आपको टैक्स में छूट मिलती है। ये कई तरह के आइटम होते हैं, जहां इन्वेस्टमेंट करके टैक्स में छूट हासिल की जा सकती है। मसलन सेक्शन 80सी से सेक्शन 80यू तक जो भी आइटम हैं, उन्हें डिडक्शन के तहत माना जाता है।



ग्रॉस इनकम

टैक्स फ्री आमदनी और भत्तों को छोड़कर आपकी साल की कुल आमदनी जो भी है, उसे ग्रॉस इनकम कहा जाता है। ग्रॉस इनकम हमेशा 80 सी से 80 यू तक मिलने वाले डिडक्शन से पहले वाली इनकम होती है।



टैक्सेबल इनकम

ग्रॉस इनकम में से 80 सी से 80 यू तक मिलने वाले डिडक्शन क्लेम कर लेने के बाद जो इनकम आती है, उसे टैक्सेबल इनकम कहते हैं। यानी डिडक्शन से पहले वाली इनकम ग्रॉस इनकम और डिडक्शन के बाद वाली इनकम को टैक्सेबल इनकम कहते हैं।



टीडीएस

आपकी जो भी आमदनी होती है, सरकार उस पर टैक्स काटती है। इसे टैक्स डिडक्टेड ऐट सोर्स कहा जाता है। जो संस्था आपको पेमेंट कर रही है, वही टैक्स की इस रकम को काटकर बाकी रकम आपको पे करती है। मसलन आपकी कंपनी आपको जो सैलरी देती है, वह उस पर बनने वाले टैक्स को काटकर बाकी रकम आपके खाते में ट्रांसफर करती है। टीडीएस काटने का काम एंम्प्लॉयर या पेमेंट करने वाली संस्था का है। इसे काटना या जमा करना लेने वाले की जिम्मेदारी नहीं है। आमतौर पर जब कोई संस्था किसी काम के बदले आपको पे करती है, तो वह 10 फीसदी की दर से टीडीएस काटती है।



सीनियर सिटिजन

जिन लोगों की उम्र 31 मार्च 2016 को 60 साल या उससे ज्यादा है, उन्हें सीनियर सिटिजन माना जाएगा। सुपर सीनियर सिटिजन इसी तरह जिन लोगों की उम्र 31 मार्च 2016 को 80 साल से ज्यादा है, वे सुपर सीनियर सिटिजंस होंगे। आप जिस फाइनैंशल इयर का रिटर्न भर रहे हैं, उसके अंतिम दिन 31 मार्च को उम्र की गणना की जाती है।



इनकम टैक्स रिफंड

अगर किसी टैक्सपेयर ने सरकार को ज्यादा टैक्स दे दिया है, तो वह उस रकम को सरकार से वापस ले सकता है। इस वापस आई रकम को ही रिफंड कहा जाता है। टैक्स रिटर्न भरकर आप इस एक्स्ट्रा रकम को इनकम टैक्स विभाग से क्लेम करते हैं। इसके बाद रिफंड की यह रकम आपको इनकम टैक्स विभाग की ओर से आपके अकाउंट में भेज दी जाती है।



फॉर्म 26 AS

फॉर्म 26एएस एक कंसॉलिडेटेड टैक्स स्टेटमेंट है। इसमें खासतौर से तीन तरह के ब्योरे होते हैं। पहला टीडीएस का ब्योरा, दूसरा टैक्स कलेक्टेड ऐट सोर्स का ब्योरा और तीसरा टैक्सपेयर द्वारा बैंक में जमा कराया गया एडवांस टैक्स/सेल्फ असेसमेंट टैक्स का ब्योरा। फॉर्म 26 एएस से आप यह पता लगा सकते हैं कि कंपनी या बैंक ने आपका जो टीडीएस काटा है, उसे सरकार के पास जमा कराया भी है या नहीं। इस टीडीएस का ब्योरा आप दो तरह से देख सकते हैं। पहले incometaxindiaefiling.gov.in पर जाएं। अगर आप पिछले सालों में रिटर्न भर चुके हैं तो आपके पास यूजर नेम और पासवर्ड होगा। इसी से लॉग-इन करें। अगर पहली बार रिटर्न भर रहे हैं तो Register Yourself पर जाकर रजिस्टर करें। वैसे यूजर नेम आपका पैन नंबर होता है और पासवर्ड आप खुद जेनरेट करेंगे। लॉग-इन करने के बाद View Form 26 AS पर क्लिक करें। अगर आप नेट बैंकिंग इस्तेमाल करते हैं तो बैंक की वेबसाइट पर जाकर View Your Tax Credit पर क्लिक करके फॉर्म 26 एएस देख सकते हैं, लेकिन इससे केवल उस बैंक में चल रही आपकी एफडी, सेविंग्स अकाउंट पर ब्याज आदि का ही पता चलेगा।



फॉर्म 16 A

अगर सैलरी के साथ-साथ दूसरे जरियों से भी आपको आमदनी हुई हो और उस पर टीडीएस कट चुका हो तो उस संस्था से भी टीडीएस सर्टिफिकेट ले लें। इस सर्टिफिकेट को ही फॉर्म 16ए कहा जाता है। यहां हम रेंटल इनकम, शेयर, एफडी वगैरह से होने वाली इनकम की बात कर रहे हैं। एफडी के मामले में आपका बैंक आपको यह सर्टिफिकेट देगा।





 इनकम टैक्स रिटर्न फाइल मे क्या हैं जरूरी कागजात आइए समझें -



इनकम टैक्स रिटर्न भरने के लिए कुछ जरूरी कागजात तैयार रखने होते हैं. इनकी मदद से आयकर रिटर्न खुद भी ऑनलाइन फाइल की जा सकती है. यदि किसी की मदद लेनी भी है तब भी उसे इन कागजातों को उपलब्ध कराना होता है.


 पैन कार्ड (PAN Card): आईटीआर (ITR 2018-19) भरने के लिए सबसे पहले व्यक्ति के पास पैन कार्ड होना ज़रूरी है, क्योंकि ऑनलाइन आईटीआर जमा कराने के लिए इनकम टैक्स इंडिया की साइट पर पैन कार्ड के ज़रिये ही आपका एकाउंट बनाया जा सकता है.

  
आधार कार्ड (Aadhaar Card): आईटीआर फाइल (ITR filing) करने के लिए अब आधार कार्ड और पैन कार्ड का आपस में लिंक होना ज़रूरी है, जो आसानी से किया जा सकता है.


बैंक अकाउंट डिटेल : आईटीआर भरने के लिए व्यक्ति को वित्तीय लेन-देन की जानकारी देनी होती है, इसलिए आयकरदाता को पता होना चाहिए‍ कि उसके बैंक खाते या खातों पर उसे पूरे वित्तवर्ष के दौरान कितना ब्याज मिला है. इसके लिए बैंक खाते या खातों की पूरी जानकारी हाथ में होनी चाहिए, ताकि वित्तीय लेनदेन की सही जानकारी आईटीआर में दाखिल करने में आसानी हो.



फॉर्म 16 (Form 16): हर नौकरीपेशा को उसकी नियोक्ता कंपनी फॉर्म 16 उपलब्ध कराती है. आईटीआर (ITR online filing) भरने के दौरान फॉर्म 16 होना भी ज़रूरी है. इस फॉर्म में किसी वित्तीय वर्ष में मिलने वाली पूरी सैलरी और टीडीएस की जानकारी दी गई होती है. यदि किसी ने नौकरी बदली है, तब उसे यह अपनी पुरानी कंपनी से भी लेना होगा. अभी समय है, यह काम किया जा सकता है.
  

निवेश का ब्योरा: आईटीआर फाइल करने वाले ने इक्विाटी लिंक्ड म्यूचुअल फंड या पीपीएफ में निवेश किया है, या कोई जीवन बीमा पॉलिसी खरीदी है, तो यह उसके लिए फायदेमंद है. जीवन बीमा, बच्चे की ट्यूशन फीस आदि से टैक्स में छूट मिलती है, इसलिए जो भी निवेश किया गया है, उसकी डिटेल तैयार रखनी चाहिए.

   
लोन डिटेल: जिन लोगों ने होम लोन या / और एजुकेशन लोन ले रखा है, वे ध्यान रखें, उस पर दिए जाने वाले ब्याज पर भी टैक्स में छूट मिलती है. ऐसे में इन लोन का ब्योरा आईटीआर फाइल करते समय पास रखना ज़रूरी है.



ऑनलाइन रिटर्न फाइल करने का तरीका



1.            इनकम टैक्स को ऑनलाइन भरने की प्रक्रिया को ई-फाइलिंग (e-Filing) कहा जाता है. यह सरल है. आसानी से किया जा सकता है. सभी संबंधित कागज यदि तैयार हों और पास रखकर बैठें हों तो कंप्यूटर से ई-फाइलिंग करने में कोई दिक्कत नहीं है. इससे समय भी बचता है. आयकर विभाग की वेबसाइट है - incometaxindiaefiling.gov.in

2.            इनकम टैक्स रिटर्न की ई-फाइलिंग के लिए सबसे पहले इनकम टैक्स विभाग की वेबसाइट पर अकाउंट बनाना होगा. इसमें अकाउंट बनाने के लिए पैन नंबर और डेट ऑफ बर्थ (जन्मदिवस) जैसी निजी जानकारी का प्रयोग करना होता है. इनकम टैक्स विभाग की साइट पर दिए गए लिंक पर क्लिक करके अकाउंट बनाया जा सकता है. यहां पर पैन नंबर (PAN) यूजर आईडी होता है.

3.            ई-फाइलिंग के दो तरीके हैं- पहला है कि आयकर विभाग की वेबसाइट के डाउनलोड सेक्शन पर जाएं और अपनी जरूरत और दायरे के हिसाब से जरूरी फॉर्म डाउनलोड करें. इस फॉर्म को कंप्यूटर  पर सुरक्षित कर लें. इसे सही तरीके से भर लें. इसके बाद  जेनरेट एक्सएमएल (generate XML) पर क्लिक करें, फिर से वेबसाइट पर जाएं और अपलोड एक्सएमएल (upload XML) पर क्लिक करें. उपयोगकर्ता को ध्यान रखना चाहिए कि यहां पर एक बार फिर उसे साइट पर लॉग इन करना होगा. अपलोड एक्सएमएल के जरिए वह फॉर्म अपलोड करें जो कुछ देर पहले भरा है. इसके बाद सब्मिट (submit) पर क्लिक करें. (पढ़ें - आईटीआर (ITR) ऑनलाइन भरने का आसान है तरीका)

4.            एक दूसरा आसान तरीका भी है. इसके लिए दूसरे लिंक पर क्लिक करें. e-file section पर जाइए, लॉग इन कीजिए, जो फॉर्म और असेसेमेंट ईयर अपेक्षित है उसे सेलेक्ट करें, और संबंधित जानकारी भर दें.

5.            फॉर्म चुनते समय यह सावधानी बरतें कि जो फॉर्म चुनना (सेलेक्ट करना) है, वह आपकी सैलरी के मुताबिक हो. इन्डिविजुअल (सैलरी), पेंशन इनकम, एक मकान (एक प्रॉपर्टी) से इनकम या अन्य आयस्रोतों से इनकम (लॉटरी के अतिरिक्त) के केस में फॉर्म ITR-1, जिसे 'सहज' भी कहा जाता है, सेलेक्ट करना होगा. (पढ़ें- नए आईटीआर-1 सहज फॉर्म के बारे में 10 बातें जो आपको पता होनी चाहिए) इस वेतनभोगी लोगों के लिए इस फॉर्म में कुछ बदलाव किए गए हैं. इस बार कुछ ज्यादा जानकारी मांगी जा रही है. पूंजीगत लाभ होने की दशा में ITR-2 सेलेक्ट करना होगा. एक से अधिक घर होने की दिशा में ITR-2A चुनें, लेकिन इस केस में कोई पूंजीगत लाभ (कैपिटल गेन) नहीं होना चाहिए. ITR-3,4,4S फॉर्म कारोबारियों और प्रोफेशनल्स के लिए है. (पढ़ें  - अब है आईटीआर (ITR) भरने का वक्त, कर लें तैयार ये 6 कागजात)

6.            रिटर्न फाइल करते समय अपने पास ये दस्तावेज रख लें- पैन नंबर, फॉर्म 16, बैंक खातों पर मिला संबंधित वित्तीय वर्ष का कुल ब्याज, टीडीएस (TDS) संबंधी डीटेल और सभी तरह के निवेशों संबंधी सबूत.  होमलोन और इंश्योरेंस संबंधी डॉक्युमेंट्स भी अपने पास रखें.  इनकम टैक्स की साइट से फॉर्म 26AS भी डाउनलोड कर सकते हैं जो आपकी टैक्स स्टेटमेंट शो करता है जो आपके द्वारा दिया जा चुका है. अपना टैक्स रिटर्न वैलिडेट करने के लिए इस फॉर्म का सहारा ले सकते हैं.

7.            एक नई बात, पिछले साल से एक नया नियम लागू हुआ है. यह उन लोगों के लिए है जिनकी सालाना आय 50 लाख रुपये से अधिक है. ऐसे करदाताओं को अपने फॉर्म में दिया गया एक अतिरिक्त कॉलम AL भरना होगा, इसमें उन्हें अपनी सभी संपत्तियों की वैल्यू और लायबिलिटीज़ के बारे में मांगी गई जानकारी भरनी होगी. एएल यानी असेट्स और लायबिलिटीज़.

8.            यदि डिजिटल सिग्नेचर का इस्तेमाल करके रिटर्न सब्मिट किया गया है तो फॉर्म सब्मिट करते समय acknowledgement number यानी एक प्रकार की रसीद जेनरेट होगा. यदि बिना डिजिटल सिग्नेचर के सब्मिट हुआ है तो ITR-V जेनरेट होगा और यह आपके साइट पर रजिस्टर ईमेल आईडी पर पहुंच जाएगा. ITR-V एक प्रकार की रसीद ही है कि आपका रिटर्न सब्मिट हो गया.

9.            अब इस ITR-V को साइन करके बेंगलुरु कार्यालय (जहां आपका रिटर्न प्रोसेस होता है) भेज दें, 120 दिनों के भीतर यह संबंधित कार्यालय पहुंच जाना चाहिए ताकि टैक्स फाइलिंग की प्रक्रिया पूर्ण हो सके. यदि यह कागजात आप समय से बेंगलुरु कार्यालय नहीं पहुंचाएंगे तो रिटर्न की प्रक्रिया अधूरी ही मानी जाएगी, इसलिए इसकी अनदेखी न करें. चिंता न करें, बेंगलुरु कार्यालय का पता इसी फॉर्म के आखिर में लिखा हुआ है. उस पते पर पोस्ट कर दें.

10.          टैक्सपेयर्स वेबसाइट पर ई-वेरिफाई रिटर्न ऑप्शन पर जाकर ई- वेरिफाई भी कर सकते हैं. नेट बैंकिंग के जरिए भी आप वेरिफाई कर सकते हैं. यदि इस तरीके को अपनाते हैं तो बेंगलुरु ऑफिस में ITR-V भेजे बिना भी काम चल जाएगा.



इनकम टैक्स रिटर्न भरते समय भूल कर भी न करें ये गलतियां

common mistakes to avoid while filing income tax returns



इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने टैक्सपेयर्स को आईटीआर में इनकम कम बताने या कटौती को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने जैसे हथकंडे अपनाने के प्रति आगाह किया है। विभाग ने स्पष्ट कहा है कि ऐसा करने पर आयकर कानून की धाराओं के तहत मुकदमा किया जा सकता है। विभाग ने कहा है कि ऐसे टैक्सपेयर्स के एंप्लॉयर को भी इसकी जानकारी दी जाएगी। आइए जानते हैं, इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करते वक्त हमें किन-किन गलतियों से बचना चाहिए...

  
गलत फॉर्म चुनना

किसे कौन-सा फॉर्म भरना है, इसके लिए बाकायदा नियम हैं। कई बार लोग गलत फॉर्म का चुनाव कर लेते हैं। अपनी कैटिगरी के हिसाब से सही रिटर्न फॉर्म चुनें और उसे ही भरें।
  

पुरानी जॉब की जानकारी नहीं देना

1 अप्रैल 2017 से 31 मार्च 2018 के बीच नौकरी बदलने पर पुराने एंप्लॉयर से हुई आदमनी आईटीआर में नहीं बताना आपको भारी पड़ सकता है। इसलिए, अगर आपने फाइनैंशल इयर के दौरान नौकरी बदली है तो अपने दोनों एम्प्लॉयर से फॉर्म 16 जरूर ले लें। अपने पहले एम्प्लॉयर के साथ काम के दौरान की गई सेविंग्स और उससे हुई आमदनी अगर आपने अपने नए एम्प्लॉयर को नहीं बताई है तो हो सकता है वह कम टैक्स काटे और बाद में आपको कम काटा गया टैक्स ब्याज सहित भरना पड़े।

  
इनकम की क्लबिंग को नजरंदाज करना

कई लोग पत्नी और बच्चों के नाम से भी इन्वेस्टमेंट करते हैं। आप पत्नी को कितनी भी रकम दे सकते हैं, लेकिन गिफ्ट की गई रकम को आप इन्वेस्ट करते हैं तो सेक्शन 64 सामने आ जाता है। इसके मुताबिक, गिफ्ट की गई रकम से कोई आमदनी होती है तो वह आपकी टैक्सेबल इनकम में जोड़ी जाएगी। इससे फर्क नहीं पड़ता कि पार्टनर को आमदनी होती है या नहीं। कई लोग आईटीआर भरते वक्त इस नियम का पालन नहीं करते हैं।


ब्याज से अर्जित आय शामिल नहीं करना

ITR दाखिल करते समय अक्सर लोग विभिन्न बचत खातों और निश्चित जमा रकम से अर्जित ब्याज की जानकारी नहीं देते हैं। यह ध्यान रखना जरूरी है कि आपके बचत खाते से अर्जित ब्याज पर 10,000 रुपये तक छूट दी गई है। हालांकि, एफडी से अर्जित आय पर इस छूट का लाभ नहीं मिलता। आपको रिटर्न दाखिल करते समय एफडी से मिला ब्याज नहीं छिपाना चाहिए।

  
कुछ बैंक खातों की जानकारी नहीं देना

बंद पड़े खातों के सिवा अपने सभी बैंक खातों की घोषणा करना अनिवार्य है। कई लोग अक्सर बिना किसी कारण अनेक बैंक खाते खोल लेते हैं जबकि लेनदेन उनमें से कुछ में ही होता है। बहुत सारे बैंक खातों को याद रखना न केवल मुश्किल होता है बल्कि भ्रम की स्थिति भी पैदा हो जाती है, क्योंकि रिटर्न दाखिल करते समय आपके बैंक के वार्षिक कथन की आवश्यकता होती है, अंतिम समय में भ्रम न पैदा हो इसलिए बैंक खातों की संख्या को सीमित रखने का प्रयास करें।

  
होम लोन पर टैक्स छूट का गलत दावा करना

होम लोन लेकर घर खरीदने पर सरकार टैक्स में छूट देती है। लेकिन, अगर आपने 5 साल के अंदर मकान बेच दिया तो आपको यह फायदा नहीं मिलेगा। बावजूद आपने आईटीआर में टैक्स छूट का दावा कर दिया तो मुश्किल में पड़ सकते हैं क्योंकि खरीदार भी दावा करेगा और आपकी गलती पकड़ी जाएगी।
  

खाली मकान का अनुमानित किराया नहीं बताना

अगर आप अपने एक मकान में रह रहे हैं और दूसरा मकान खाली पड़ा है तो आपको उसका अनुमानित किराया बताना होगा। इससे आपको थोड़ा ज्यादा टैक्स देना पड़ सकता है। ध्यान रहे, इसकी जानकारी नहीं देने पर कार्रवाई हो सकती है।


टीडीएस का दावा करने में गलती

चूंकि फॉर्म 26AS आपके सभी टैक्सेज का ब्योरा है, इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि आईटीआर दाखिल करने से पहले टीडीएस काट लिया गया हो। आपको यह पता करना होगा कि आईटीआर में टीडीएस की गणना फॉर्म 26AS के साथ मेल खाती है या नहीं।

  
सरकार के पास जमा नहीं हो टीडीएस

कभी-कभी एंप्लॉयर एंप्लॉयी के मद से टीडीएस कटौती करता है, लेकिन इसे आईटी डिपार्टमेंट में जमा करना भूल जाता है। इसलिए सुनिश्चित करें कि एंप्लॉयर ने आपकी सैलरी से जो टीडीएस काटा है, वह सरकार के पास जमा कर दिया गया है।

  
नंबर भरने में गड़बड़ी

रिटर्न फॉर्म में पैन, आईएफएस कोड, अकाउंट नंबर, एम्प्लॉयर का टैन जैसी कुछ फिगर्स ऐसे होती हैं जिन्हें भरते वक्त गलती होने की आशंका रहती है। इन नंबरों को ध्यान से भरें। फर्ज करें अगर आपने अपने पैन की एक डिजिट भी गलत भर दी, तो इनकम टैक्स विभाग आपके ऊपर जुर्माना लगा सकता है।

  
गलत व्यक्तिगत विवरण

आईटीआर फाइल करते वक्त सही व्यक्तिगत विवरण जैसे कि मोबाइल नंबर, ईमेल, बैंक विवरण, पता, जन्मतिथि आदि का उल्लेख करना जरूरी है। आप ऐसी स्थिति में नहीं होना पसंद करेंगे जहां आपको गलत बैंक खाते की वजह से टीडीएस रिफंड से वंचित रहना पड़े। एक गलत ई-मेल या पता का मतलब आयकर विभाग से स्वीकृति या महत्वपूर्ण सूचनाओं का गुम होना है।


खाली फॉर्म पर साइन

जो लोग किसी एजेंट के जरिए रिटर्न भरते हैं, वे अक्सर खाली रिटर्न फॉर्म पर दस्तखत करके एजेंट को दे देते हैं। एजेंट बाद में उस फॉर्म को भरकर जमा कर देता है। खाली फॉर्म पर दस्तखत न करें। फॉर्म भरने में एजेंट से गलती हो गई तो आपको दिक्कत होगी। भरे हुए रिटर्न फॉर्म पर एक नजर डाल लेने के बाद ही उस पर साइन करें।

  
आम गलतियां

आईटीआर दाखिल करने के लिए गलत डॉक्युमेंट्स का उपयोग करना, गलत वित्तीय विवरण संलग्न करना, नकद जमा का विवरण नहीं देना, जिस इनकम पर टैक्स छूट प्राप्त है, उसकी जानकारी रिटर्न में नहीं देना, गलत आकलन वर्ष का उल्लेख करना, समुचित मद के तहत कटौती का दावा करने के लिए भूल जाना जैसी गलतियों से बचें।


रिटर्न फाइल ही नहीं करना

चूंकि आप पर टैक्स की कोई देनदारी नहीं है, इसलिए आपको रिटर्न भरने की जरूरत नहीं है, यह सोच आप गलत है। रिटर्न भरने से आजादी सिर्फ उन लोगों को है, जिनकी सालाना ग्रॉस इनकम बेसिक इग्जेंप्शन लेवल से कम है। जिस किसी की भी आमदनी इससे ज्यादा है, उसे रिटर्न भरना अनिवार्य है।

  
टैक्स फ्री इनकम की जानकारी न देना

जिस आमदनी पर टैक्स नहीं देना होता है, उसकी भी जानकारी देनी होती है। मसलन, प्रविडेंट फंड (पीएफ) या टैक्स फ्री बॉन्ड्स आदि से मिल रहे ब्याज की जानकारी जरूर देनी चाहिए। हालांकि, आप अलग-अलग सेक्शन के तहत इनपर टैक्स छूट का दावा कर सकते हैं।





टैक्‍स में छूट पाने के 5 आसान तरीके

1) यदि आप रेंट पे करते हैं, तो आप टैक्स बचा सकते हैं हाउस रेंट अलाउंस (एचआरए) आपकी सैलरी का हिस्सा है। यह टैक्स बचाने का अच्छा तरीका है। आपको केवल अपने मकान मालिक से प्राप्त रसीद अपनी कंपनी में जमा करवानी है। यदि यह रेंट सालाना 1,00,000 रुपए से ज़्यादा है तो आपको मकान मालिक के पैन कार्ड की कॉपी और रजिस्टर्ड हाउस रेंट एग्रीमेंट की कॉपी भी लगानी होगी।

2) ELSS के माध्यम से म्युच्युअल फंड में निवेश करें ईएलएसएस या इक्विटी लिंक्ड सविंग स्कीम्स भी म्युच्युअल फंड ही हैं जिनमें निवेश करके आप टैक्स बचा सकते हैं। ईएलएसएस में निवेश को 3 साल तक के लोक-इन पीरियड में निवेश करना होता है। ईएलएसएस रिटर्न्स अन्य स्कीम्स की तुलना में अच्छे होते हैं और आंशिक टैक्स इन पर लगता है। आयकर अधिनियम की धारा 80 सी के तहत ईएलएसएस से आयकर छूट मिलती है।

3) टैक्स सेविंग स्कीम्स में निवेश करें फिक्स डिपॉजिट (एफ़डी) में आप 5 या 10 साल के लिए पैसा निवेश करते हैं इससे आप टैक्स बचा सकते हैं। नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट और पब्लिक प्रोविडेंट फंड में निवेश भी आपको इन्कम टैक्स बचाने में मदद करेगा। इनसे भी आयकर की धारा 80 सी के तहत टैक्स छूट मिलती है।

4) दान (डोनेशन) या चैरिटी यदि आप डोनेशन करते हैं तो आप आयकर की धारा 80जी के तहत आयकर छूट पाने के हक़दार हैं। आप अगर डोनेशन या चैरिटी करते हैं तो आप अपनी कुल आय में से 10% कम कर सकते हैं।

5) एनपीएस में निवेश राष्ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस) सरकार की पेंशन योजना है। इसमें बुढ़ापे में, लंबे समय के आधार पर बाज़ार आधारित रिटर्न्स मिलते हैं। इसमें निवेशक को ओल्ड एज सिक्योरिटी कवर मिलता है। एनपीएस में निवेश करने पर 50,000 रुपए की अतिरिक्त टैक्स छूट मिलती है।