9/25/17

gst return kaise bhare

जीएसटी क्या है?

गुड्स एंड सर्विस टैक्स को हिंदी में वस्तु और सेवा कर कहा जाता है. यह एक तरह का वैल्‍यू एडेड टैक्स है, जो गुड्स और सर्विस में जब-जब वैल्यू जुड़ती है, उसके हर स्तर पर लगता है. यानी अगर गुड्स या सर्विस में कोई वैल्यू जुड़ी है, तो उसके मुताबिक उतना टैक्स जुड़ जाएगा.


जीएसटी कौन देगा?

ऐसे कारोबारी, मैन्युफैक्चरर और ट्रेडर, जिनका सालाना टर्नओवर 20 लाख रुपये से ज्यादा हो. यानी इस लिमिट के नीचे वाले कारोबारियों को जीएसटी रजिस्ट्रेशन कराने की जरूरत नहीं. पूर्वोत्तर और विशेष श्रेणी के राज्यों के लिए यह लिमिट 10 लाख रुपये है. लेकिन अंतरराज्यीय कारोबार के लिए कोई लिमिट नहीं है, इसमें जीएसटी लगेगा.


जीएसटी और रिटर्न फाइलिंग


हर महीने की 10 तारीख तक पिछले महीने की बिक्री का स्टेटमेंट फाइल करना होगा. इसी तरह की गई खरीद या इनपुट का ब्योरा हर महीने की 15 तारीख तक दायर करना होगा. इनपुट टैक्स रिफंड के लिए हर महीने की 20 तारीख तक खरीद-बिक्री का पूरा ब्योरा यानी रिटर्न दायर करना होगा. कुल मिलाकर हर महीने तीन और साल में 37 बार फाइलिंग करनी होगी.


इनपुट टैक्स क्रेडिट क्या है?

सप्लाई चेन के हर स्तर पर आइटम की जितनी वैल्यू बढ़ती हैसिर्फ उस पर टैक्स लगता है. यानी पहले के स्तर पर जो टैक्स दिया गया हैउसकी वापसी क्लेम की जा सकती है. मान लीजिए कपड़े बनाने वाली कंपनी ने कच्चा माल खरीदते वक्त जो टैक्स दिया थावो रिटर्न फाइल करते वक्त उसका रिफंड क्लेम कर सकता है.
इसी तरह कोई सर्विस प्रोवाइडर मान लीजिए डीटूएच कंपनी हैतो वो अपने प्रोडक्ट में इस्तेमाल आइटमजैसे डिश एंटीना की खरीदी में दिए गए टैक्स के रिफंड का क्लेम कर सकती है.


GST में कारोबारियों की 3 वर्ग

जीएसटी के तहत कारोबारियों की 3 श्रेणी बनायी गयी हैं. पहली 20 लाख तक सालाना टर्नओवर वाली, दूसरी 20 से 75 लाख और तीसरी श्रेणी 75 लाख से ज्यादा टर्नओवर वाली है. कारोबारियों की परेशानियों और शंकाओं को दूर करने के लिए चार्टड अकाउंटेंट सुनील भंसाली ने तीनों श्रेणियों में आने वाले कारोबारियों के सवालों के जवाब देने की कोशिश की है.

20 लाख तक सालाना टर्नओवर वाले कारोबारी पर असर
जहां तक 20 लाख से नीचे के दुकानदारों का मतलब है उनके ऊपर टैक्स का कोई फर्क नहीं पड़ेगा, जीएसटी से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, पहले भी वो टैक्स नहीं देते थे, अब भी जीएसटी की छूट वाली श्रेणी में पड़ेंगे, उनको अब टैक्स देने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी. जीएसटी आने के बाद 20 लाख तक सालाना टर्नओवर वाले कारोबारियों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

20 से 75 लाख तक सालाना टर्नओवर वाले कारोबारी पर असर
ऐसे व्यापारियों को मौजूदा कानून के मुताबिक सामान बेचने पर वैट और कई दूसरे टैक्स देने पड़ते हैं, वैट बचाने के लिए ऐसे व्यापारी या तो ग्राहकों को बिल नहीं देते थे या फिर अपने पास मौजूद सामानों बिक्री नहीं दिखाते थे, नतीजा बचा हुआ पैसा इनके खाते में रह जाता था, लेकिन जीएसटी आने के बाद ऐसा करना नामुमकिन हो जाएगा, इन व्यापारियों के पास सिर्फ दो ही विकल्प होंगे.
पहला- जीएसटी में रजिस्ट्रेशन कराएं, इससे ग्राहकों से जीएसटी चार्ज कर पाएंगे और इनपुट क्रेडिट भी ले पाएंगे.
दूसरा- सरकार की कंपोजिट स्कीम लेने का दूसरा विकल्प होगा. इसमें उन्हें सालाना टर्नओवर का 0.5 फीसदी टैक्स देना पड़ेगा, यानि 75 लाख के टर्नओवर पर सालाना 37500 रूपए टैक्स देना होगा, इसके अलावा और कोई टैक्स नहीं मिलेगा जो इन्होंने अपने प्रोडक्ट में जीएसटी दी है उसकी क्रेडिट नहीं ले सकते हैं, और ना ही वो अपने कस्टमर से जीएसटी चार्ज कर सकते हैं, ये जो 0.5 फीसदी जो है उसे ऐसा समझा जाए कि ये .5 फीसदी उनके फायदे से जाएगा

75 लाख से ज्यादा सालाना टर्नओवर वाले कारोबारी पर असर
जीएसटी का सबसे ज्यादा असर 75 लाख से ज्यादा सालाना टर्नओवर वाले व्यापारियों पर ही पड़ने वाला है, अक्सर ऐसे व्यापारियों के साथ फर्ज़ी इन्वॉयस, गलत तरीके से रिफंड बिक्री के आंकड़ों और रिटर्न में छेड़छाड़ की शिकायतें आती हैं, लेकिन अब जीएसटी आने के बाद ऐसा करना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि सही जानकारी नहीं दी तो सामान पर ज्यादा टैक्स देना पड़ेगा और टैक्स क्रेडिट भी तभी मिलेगा जब व्यापारी सामान की बिक्री पर अपना मुनाफा दिखाकर टैक्स जमा करेगा

GST return file process


रिटर्न फाइलिंग बड़ा आसान है। लोगों को फाइलिंग प्रक्रिया को लेकर चिंता करने की जरूरत नहीं है। यह बहुत पारदर्शी है और मशीन से होती है। जब एक सप्‍लायर सेल इन्‍वॉइस की डिटेल अपलोड करता है, जीएसटी रिटर्न-1 माह की 10 तारीख को जनरेट होता है। जीएसटीआर-1 में सप्‍लायर्स द्वारा दिया गया विवरण खरीदार के जीएसटीआर-2 में स्‍वत: अपडेट हो जाता है। जीएसटीआर-2 को माह की 15 तारीख को कम्‍प्‍यूटर पर कुछ क्लिक के जरिये फाइल करना है। जीएसटीआर-2 में पूर्ण रिटर्न फाइल करने की आवश्‍यकता नहीं है  केवल बी2बी डीलर्स को ही जीएसटीआर-1 और जीएसटीआर-2 दोनों फाइल करने की आवश्‍यकता है, रिटेलर्स को जीएसटीआर-2 फाइल करने की कोई जरूरत नहीं है, उन्‍हें केवल यह जांच करनी है कि डीलर ने जीएसटी नेटवर्क पर जो जानकारी अपलोड की है वह सही है या नहीं। महीने की 17 तारीख को सप्‍लायर्स और प्राप्‍तकर्ता दोनों को इन्‍वॉइस डिटेल्‍स का मिलान करना होगा और महीने की 20 तारीख को जीएसटीआर-3 फाइल करना होगा।



GST-composition-scheme in Hindi

कंपोजिशन स्कीम दरअसल छोटे कारोबारियों को राहत देने के मकसद से लायी गयी योजना है. इसके तहत जिनका सालाना कारोबार 20 लाख रुपये से ज्यादा लेकिन 75 लाख रुपये से कम है, वो भाग ले सकते हैं. योजना के तहत, ट्रेडर्स को 1 फीसदी, उत्पादकों को 2 फीसदी और रेस्त्रां चलाने वालों को 5 फीसदी की दर से एकमुश्त टैक्स चुकाना होगा. बहरहाल, इस योजना में भाग लेने वालों को ना तो इनपुट टैक्स क्रेडिट का फायदा मिलेगा और ना ही ये अपने ग्राहको से जीएसटी वसूल सकते हैं. एक बात और, एक राज्य से दूसरे राज्य में कारोबार करने वाले, जीएसटी की छूट वाले सामान का कारोबार करने वाले, आइसक्रीम व तंबाकू आधारित सामान बनाने वाले इस योजना में शामिल नहीं हो सकते. साथ ही रेस्त्रां करो छोड़ किसी और तरह की सेवा मुहैया कराने वालों के लिए ये योजना नहीं है.

कंपोजिशन स्कीम में शामिल होने वालों को अलग से टैक्स वसूलने की इजाजत नहीं होगी.

तो क्या कंपोजिशन स्कीम अपनाने वालों की जगह पर सामान सस्ता मिलेगा?  बिल्कुल नहीं. वजह ये है कि ये कारोबारी जो कच्चा माल या इनपुट खऱीदेंगे, उनपर औरों की तरह उन्हे जीएसटी चुकाना ही होगा. अब उन्होंने जो टैक्स चुकाया है, वो उनकी लागत में शामिल हो जाएगा. लागत पर मार्जिन जोड़ने के बाद जो अंतिम कीमत बनेगी, उस पर 1, 2 या 5 फीसदी की तरह से जीएसटी चुकाना होगा. ऐसे में आम व्यापारियों के मुकाबले जीएसटी व्यापारियों के यहां सामान सस्ता होने का मतलब ही नहीं बनता.


कंपोजिशन स्कीम में भाग लेने वालों को तीन महीने का रिटर्न एक बार दाखिल करना होगा जबकि दूसरे व्यापारियों को हर महीने. यही नहीं जीएसटी का भुगतान तीन महीने में एक बार करना होगा.


Input tax credit in Hindi

इनपुट टैक्स क्रेडिट से आप आपके जीएसटी के बोझ को कम कर सकतें है। इसलिए इसके बारे में विस्तार से जानना जरूरी है।
आपने पक्के बिल से माल खरीदने पर जो टैक्स भरा होगा, उस पर इनपुट टैक्स क्रेडिट मिलेगा। यह इनपुट टैक्स क्रेडिट आपको जीएसटी रिटर्न भरने से मिल जाएगा। आसान शब्दों में मान लीजिए आपने 100 रुपए का कोई सामान खरीदा तो उस पर आपको 18 रुपए जीएसटी तुरंत देना पड़ेगा। मतलब उस सामान के बदले में आपको 118 रुपए चुकाने होंगे। मान लीजिए आपने 100 रुपए का सामान 200 रुपए में बेचा तो आपको कस्मटर से 36 रुपए जीएसटी का लेना होगा। मतलब उसे आपको 236 रुपए चुकाने पड़ेगे। ऐसे में आप जब जीएसटी का रिटर्न भरेंगे तो आपकी देनदारी 36 की होगी। चूंकि आप 18 रुपए पहले (माल खरीदते वक्त) ही भर चुके हैं, इसलिए आपको 18 रुपए ही चुकाने होंगे। मतलब आपको 18 रुपए कम चुकाने होंगे।
इनपुट टैक्स क्रेडिट की शर्तें

इनपुट टैक्स क्रेडिट का फायदा आपको तभी मिलेगा, जब आपने माल खरीदते वक्त पक्का बिल लिया हो और आपने जिस डीलर से माल लिया था, उसने सही समय पर जीएसटी रिटर्न भरा हो। क्योंकि अगर आपने किसी ऐसे डीलर से टैक्स लिया जिसने समय से टैक्स का भुगतान नहीं किया है तो भी आपको  इनपुट क्रेडिट टैक्स का लाभ नहीं मिलेगा। ऐसे में अगर आपने पहले से ही क्रेडिट ले रखा है तो आपको इसे ब्याज समेत वापस भी लौटाना होगा।