7/17/26

upanishad me kya hai

उपनिषदों का कोई एक रचयिता नहीं है। ये प्राचीन ज्ञान और दार्शनिक संवादों का संकलन हैं जिन्हें विभिन्न ऋषियों ने पीढ़ियों तक मौखिक रूप से आगे बढ़ाया

 उपनिषद सनातन धर्म के सर्वोच्च और गूढ़तम दार्शनिक ग्रंथ हैं जो वेदों का अंतिम भाग (वेदांत) माने जाते हैं। 'उपनिषद' का शाब्दिक अर्थ 'गुरु के समीप बैठकर ज्ञान प्राप्त करना' है। इनमें आत्मा (स्वयं), परमात्मा (ब्रह्म), और सृष्टि के संबंधों का दार्शनिक विश्लेषण है।

उपनिषद् हिन्दू धर्म के महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है। इस ग्रंथ में ब्रह्म यानी ईश्वरीय सत्ता के स्वभाव और आत्मा के बीच अंतर्संबंध की दार्शनिक तथा ज्ञान-पूर्वक संपूर्ण व्याख्या की गई है। उपनिषद् को श्रुति ग्रंथ में शामिल किया गया है। ऐसा कहा जाता है कि उपनिषद् ही सभी भारतीय दर्शनों की जड़ है। फिर चाहें वह वेदांत, सांख्य, जैन या फिर बौद्ध ही क्यों न हो। हालाँकि उपनिषद को समझ पाना आसान नहीं है। क्योंकि इसमें परमज्ञान, परमविद्या और इस लोक की परिधि से बाहर की बातें की गई हैं। इसमें इस संसार का गूढ़ ज्ञान निहित है।

उपनिषद देव वाणी संस्कृत में लिखे गए हैं और इनकी भाषा शैली भी गद्य और पद्य दोनों ही रुपों में है। उपनिषदों में गुरु शिष्यों के बीच संवाद को प्रकट किया गया है जिसमें शिष्य अपने गुरु से अपनी जिज्ञासाओं को पूछ रहे हैं और गुरु अपने शिक्षक की उनकी उन जिज्ञासाओं का समाधान कर रहे हैं। जैसे कि गुरुओं ने अपने शिष्यों की सभी शंकाओं को सिद्धांतों के अनुसार दूर किया है।

वहीं इसमें याज्ञवल्क्य और उनकी पत्नी मैत्रेयी के मध्य हुआ वह संवाद भी वर्णित किये गए हैं जो मनुष्यों के मन में धन आदि के मोह के प्रति वैराग्य उत्पन्न करते हैं। इतिहासकार मैक्समूलर ने इन उपनिषदों का अनुवाद किया था। इसके अलावा मुगल काल में दारा शिकोह ने फारसी भाषा में उपनिषदों का अनुवाद किया था।


 उपनिषद् की संख्या

मूल रूप से उपनिषदों की संख्या 108 है, जिन्हें अलग-अलग कालखंड के रूप में वर्गीकृत किया गया है। जैसे -

    ऋग्वेदीय - 10 उपनिषद

    शुक्ल यजुर्वेदीय - 19 उपनिषद्

    कृष्ण यजुर्वेदीय - 32 उपनिषद्

    सामवेदीय - 16 उपनिषद्

    अथर्ववेदीय - 31 उपनिषद्

हालाँकि 108 उपनिषदों में से 10 उपनिषदों को प्रमुख माना जाता है। इनमें ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य और बृहदारण्यक शामिल हैं। आदि गुरु शंकराचार्य ने इन्ही दस उपनिषदों पर अपना भाष्य दिया है। ‘सत्यमेव जयते’ मुण्डक उपनिषद से ही लिया गया है। वैसे कुछ विद्वान कौषीतकि और श्वेताश्वरतर की भी, मुख्य उपनिषदों में गणना करते हैं। हालाँकि कुछ उपनिषदों को वेदों की संहिताओं का अंश माना गया है।


यहाँ उपनिषदों के कुछ सबसे प्रसिद्ध और प्रेरणादायक अनमोल विचार दिए गए हैं:

    सत्य और प्रकाश की प्रार्थना: "असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय।" (हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमरता की ओर ले चलिए।) - बृहदारण्यक उपनिषद

    स्वयं को पहचानें: "अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ही ब्रह्म हूँ।) और "अयमात्मा ब्रह्म" (यह आत्मा ही ब्रह्म है।) - बृहदारण्यक/मांडूक्य उपनिषद

    इच्छा और संकल्प की शक्ति: "आप वही हैं जो आपकी गहरी, प्रबल इच्छा है। जैसी आपकी इच्छा है, वैसा ही आपका संकल्प है। जैसा आपका संकल्प है, वैसे ही आपके कर्म हैं और जैसे आपके कर्म हैं, वैसा ही आपका भाग्य है।" - बृहदारण्यक उपनिषद

    शरीर और आत्मा का रहस्य: "आत्मा को रथ का स्वामी और शरीर को रथ समझो। बुद्धि को सारथी और मन को लगाम समझो। इंद्रियों को घोड़े और उनके विषयों को रास्ते समझो।" - कठोपनिषद

    परम आनंद: "यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति" (जो असीम या अनंत है, उसी में सच्चा सुख है, सीमित वस्तुओं में कोई सुख नहीं है।) - छान्दोग्य उपनिषद

    समभाव: "ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्" (इस संसार में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है।) - ईशावास्य उपनिषद 


उपनिषदों के इन शाश्वत विचारों को अपने दैनिक जीवन में उतारकर आप आंतरिक शांति, स्पष्टता और मानसिक शक्ति प्राप्त कर सकते हैं।

उपनिषदों का मूल उद्देश्य मनुष्य को अज्ञान से मुक्त कर आत्मज्ञान (ब्रह्मज्ञान) कराना है। ये ग्रंथ सिखाते हैं कि व्यक्तिगत आत्मा (Atman) और सार्वभौमिक सत्य (Brahman) एक ही हैं। इनका लक्ष्य मनुष्य को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति (मोक्ष) दिलाकर परम शांति और सत्य की अनुभूति कराना है।

उपनिषदों में निहित ज्ञान हमें यह समझने में सहायता करता है कि हम कौन हैं, इस संसार में हमारा उद्देश्य क्या है, और जीवन को किस दिशा में ले जाना चाहिए। उपनिषदों का मुख्य उद्देश्य यह है कि वे हमें हमारे आत्मा के सत्य से अवगत कराएं, जो भौतिक संसार की सीमाओं से परे है।


उपनिषदों से जीवन-सूत्र

1="शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्" ~इंसान अपने शरीर से ही सारे धर्म (कर्तव्य) को पूरा कर सकता है। अर्थात मनुष्य का सबसे पहला धर्म यही है कि वह सबसे पहले अपने शरीर की रक्षा करे। 

2= "प्रथमेनार्जिता विद्या द्वितीयेनार्जितं धनं। तृतीयेनार्जितः कीर्तिः चतुर्थे किं करिष्यति" ~ब्रह्मचर्य आश्रम में विद्या, गृहस्थ आश्रम में धन, वानप्रस्थ आश्रम में कीर्ति (यश) अर्जित करें। अगर इन तीनों में कुछ न कर सके तो चतुर्थ (सन्यास)आश्रम में भी कुछ नहीं कर सकते। अतः हमें अपना अनमोल जीवन उद्देश्य समझना चाहिए।

3="ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते" संस्कृत का यह पद्य वृहदारण्यक उपनिषद का है। ~परमब्रम्ह परमात्मा सभी प्रकार से सदा-सर्वदा परिपूर्ण है। पूरा संसार उसी ब्रह्मा से पूर्ण है, अर्थात उसकी मौजूदगी सभी जगह है। यह पूर्ण भी उसी पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है। पूर्ण में से पूर्ण को निकाल देने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है। 

4= ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। ~"परमेश्वर हम सबकी साथ-साथ रक्षा करें। हम सबको ज्ञान की प्राप्ति हो, ज्ञान की प्राप्ति कर हम तेजस्वी बने। हम सब आपस में विद्वेष न करें। इस प्रकार की भावना रखने वाले का मन पवित्र और निश्चल रहता है। निर्मल मन से उज्जवल भविष्य की कामना की जा सकती है।" कठोपनिषद के इस पद्य को भोजन मंत्र के तौर पर उपयोग किया जाता है।

5= "येषां न विद्या न तपो न दानं, ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्म:। ते मृत्युलोके भुवि भारभूता, मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति" ~जिसके पास न विद्या है, जिसने तप न किया, जो इंसान धन रहते हुए भी दान न किया, जिसके पास न कोई गुण है और न ही शालीनता है, वह मनुष्य होते हुए भी जानवर के समान भ्रमणशील रहते हैं। 

6= "हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्य मुखम् अपिहितम् अस्ति। पूषन् तत् सत्यधर्माय दृष्टये त्वम् अपावृणु ॥" ~सत्य का मुख चमकीले सुनहरे ढक्कन से ढका है; हे पोषक सूर्यदेव! सत्य के विधान की उपलब्धि के लिए, साक्षात् दर्शन के लिए तू वह ढक्कन अवश्य हटा दे।

7="शेवधिः अनित्यं इति अहं जानामि हि धृवम् हि तत् अधृवैः न हि प्राप्यते। ततः मया अनित्यैः द्रव्यैः नचिकेतः अग्निः चितः तेन नित्यं प्राप्तवान् अस्मि ॥" ~मैं धनकोष के विषय मे जानता हूँ कि वह अनित्य है; अनित्य (अध्रुव) पदार्थो से उस ‘तत्त्व’ की प्राप्ति नहीं होती जो नित्य (ध्रुव) है। इसलिए मैंने नचिकेता, अग्नि को संचित किया है तथा अनित्य पदार्थों की हवि देकर ‘नित्य’ तत्त्व को प्राप्त किया है।

 8="तपः दमः कर्म इति तस्यै प्रतिष्ठा। वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यम् आयतनम् ॥" ~ तप, आत्म-विजय (दम) तथा कर्म इस अन्तरज्ञान के आधार (प्रतिष्ठा) हैं, ‘वेद’ इसके सब अंग हैं, सत्य इसका धाम है।

9="अतिथि देवो भव: !" ~वेदों में अतिथियों को देवता सदृश बताया गया है। अतिथि देवता समान होते हैं। 

10="मातृ देवो भव और पितृ देवो भव।" ~माता और पिता देव सदृश ही हैं। 

11="सत्यम्, शिवम्, सुंदरम्: !" ~सत्य ही शिव है और सत्य ही सुंदर है। इस उक्ति में मुख्य रूप से सत्य के महत्व को दर्शाया गया है। सत्य के मार्ग पर चल कर ही आप शिव और आंतरिक प्रसन्नता को प्राप्त करते हैं। सत्य ही हमारे मस्तिष्क, बोली और कृत्यों में एकरूपता या मेल स्थापित करता है। धर्म के तीन पक्ष भी सत्य, शिव और सुंदर ही हैं। एक और उक्ति सत्, चित्त और आनंद का भी यही अभिप्राय है। यहां चित्त चेतना और आनंद सुंदर या आंतरिक प्रसन्नता का द्योतक है।

12='वसुधैव कुटुंबकम' ~पूरी दुनिया ही मेरा परिवार है। यदि भेद है, भिन्नता है, पार्थक्य है- चाहे वह भाषा की वजह से हो, धर्म की वजह से हो, भौगोलिक सीमाओं की वजह से हो, यदि किसी भी वजह से पराएपन का बोध है तो संघर्ष भी होगा, कटुता भी होगी। फलतः फिर शांति स्थापित नहीं हो सकती। "

13="तत्वम् असि!" (छांद्योग्य उपनिषद) ~हर प्राणी में एक ही प्रकार का जीव है अर्थात जो जीव आप में है, वही मुझमें है। 

14="अहम् आत्मा ब्रह्म !" (मंडूक उपनिषद) ~आत्मा या जीव और ब्रह्म- सब एक ही हैं। 

15= "अहम् ब्रह्म अस्मि !" (बृहदारण्यक उपनिषद) ~अगर आपमें, मुझमें और दूसरों में विद्यमान जीव एक ही है तो हम सभी एक ही परिवार के सदस्य हैं। इसके सत्य को आत्मसात करने पर कोई भी व्यक्ति दुनिया के किसी भी भाग में अजनबी नहीं समझा जाएगा। उसे कहीं भी किसी प्रतिकूल घटना का डर या उसके प्रति किसी प्रकार की घृणा नहीं रहेगी।

16= " तपः दमः कर्म इति तस्यै प्रतिष्ठा। वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यम् आयतनम् ॥ " ~तप, आत्म-विजय (दम) तथा कर्म इस अन्तरज्ञान के आधार (प्रतिष्ठा) हैं, ‘वेद’ इसके सब अंग हैं, सत्य इसका धाम है।

 17= " यः विद्यां च अविद्यां च तत् उभयं सह वेद अविद्यया मृर्युं तीर्त्वा विद्यया अमृतम् अश्नुते ॥ " ~जो तत् को इस रूप में जानता है कि वह एक साथ विद्या और अविद्या दोनों है, वह अविद्या से मृत्यु को पार कर विद्या से अमरता का आस्वादन करता है। 

18=ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥ ~इस वैश्व गति में, इस अत्यन्त गतिशील समष्टि-जगत् में जो भी यह दृश्यमान गतिशील, वैयक्तिक जगत् है-यह सबका सब ईश्वर के आवास के लिए है। इस सबके त्याग द्वारा तुझे इसका उपभोग करना चाहिये; किसी भी दूसरे की धन-सम्पत्ति पर ललचाई दृष्टि मत डाल।

19= " समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरं ॥" ~समस्त भूतों में समभाव से स्थित परमेश्वर को देखना।

 20= " शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ " ~हे कौन्तेय ! वह शरीर में स्थित हुआ भी वास्तव में न करता है और न ही किसी कर्म से लिप्त होता है ।

21= " विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥" ~एक अंश द्वारा इस सम्पूर्ण संसार को व्याप्त कर मैं स्थित हूँ। 

22= " वासुदेवः सर्वमिति ॥ " ~सब वासुदेव ही हैं। 

23= " यं यं वाऽपि स्मरन्भावं तयजत्यन्ते कलेवरम् तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भाव भावितः ॥ " ~हे कौन्तेय ! अन्त में मनुष्य जिस - जिस भाव को स्मरण करता हुआ देह त्यागता है, सदा उसी भाव से भावित होकर उस-उस को ही प्राप्त होता है ।

24= " यद्यविभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोऽश संभवम् ॥ " ~जो कुछ भी ऐश्वर्यशाली तथा कान्तियुक्त तथा उत्कृष्ट वस्तु है, उन सभी को तम मेरे तेजस अंश से ही उत्पन्न समझो । 

25=" यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतऽर्जुन । ज्ञानाग्नि सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ " ~हे अर्जुन ! जैसे प्रज्जवलित अग्नि ईंधन को जलाकर भस्म कर देती है, उसी तरह ज्ञान सम्पर्ण कर्मों को निर्बीज कर देता है। 

26=ममैवांशो जीवलोके जीवभूत : सनातनः ॥ अर्थ- इस जीवलोक में यह सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश है ।

 27= " नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः! " ~यह आत्मा नित्य , सर्वगत , स्थाणु , अचल और सनातन है। 

28=" नहि कल्याणकृत् कश्चित् दुर्गति तात गच्छति ॥ " ~हे तात ! कोई भी कल्याणकृत कुत्सित गति को नहीं प्राप्त होता है ।

29= " क्षोत्रज्ञं चापि मां विद्धि ॥ " ~हे अर्जुन ! क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही समझो ।

30= " एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्थात् कृतकृत्यश्च भारत ॥ " ~हे अर्जुन ! इस गुह्यतम तत्व को जानकर ज्ञानीपुरुष कृतकृत्य हो जाता है ।

31=" अहमादिहि देवानों महर्षीणां च सर्वशः।। " ~हे अर्जन ! मैं सब प्रकार से देवताओं तथा महर्षियों का आदि कारण हूँ । 

32=" अहं कृत्सनस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्ता नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा । । " ~हे अर्जुन ! म सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति तथा प्रलय हूं ।

33= "अविकार्योऽयमुच्यते । " ~यह आत्मा अविकार्य कहा जाता है ।

34=" अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम ।। "~प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी म करने वाला योगी पिछले अनेक जन्मों के संस्कार वश सम्पूर्ण पापों से रहित होकर तत्काल परमगति को प्राप्त हो जाता है।

35=अथ परा यथा तदक्षरमधिगम्यते ॥ ~ जिस परा विद्या से उस अक्षर अर्थात् ब्रह्म का ज्ञान होता है । 

36=" अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः ॥ " ~यह पुरुष प्राणरहित , मनरहित तथा शुद्ध है। 

37= एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः ॥ ~यह आत्मा अणु ( सूक्ष्म ) है , विशुद्ध है तथा ज्ञान द्वारा जानने योग्य है ।

38= कर्तारमीरां पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ॥ ~ब्रह्म के भी उत्पतिस्थान उस जगत् के कारक ईश्वर पुरुष को देखता है ।

39= ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निश्कलं ध्यायमानः ॥ ~ज्ञानलाभ से पुरुष विशुद्धचित्त वाला हो जाता है , तभी वह ध्यान करते हुए उस निष्कल आत्मतत्त्व का साक्षात्कार करता है ।

40= क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥ ~उस परावर ब्रह्म से साक्षात्कार हो जाने पर इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं ।

41= तथा विद्वान् नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ ~उसी प्रकार विद्वान नामरूप से मुक्त होकर परात्पर दिव्य पुरुष को प्राप्त हो जाता है ।

42= तमेवभान्तमनु सर्वं तस्य भाषा सर्वमिदं विभाति ।।~ उस ब्रह्म के प्रकाशित होने पर ही सभी प्रकाशित होते हैं । उसके प्रकाश से ये सब आदित्यादि प्रकाशित होते हैं ।

43=तयोरन्यः पिप्पलं स्वाइत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ।।~ उसमें से एक तो स्वादिष्ट कर्मफल को भोगता है तथा दूसरा तटस्थभाव से साक्षीरूप से प्रकाशित होता है ।

44= तेषमेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद्यैस्तु चीर्णम् ॥ ~जिसने विधिवत् शिरोव्रत का अनुष्ठान किया है , उसे ही इस ब्रह्म विद्या का उपदेश देना चाहिए ।

45= दिव्यो ह्यमूर्त पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरों ह्याजः । अप्राणो ह्यमना : शुभ्रः ॥ ~वह अक्षर ब्रह्म निश्चय ही दिव्य , अमूर्त , पुरूष , बाहर अन्दर विद्यमान , अजन्मा , अप्राण , मनरहित , विशुद्ध तथा श्रेष्ठ अक्षर से भी उत्कृष्ट है ।

46= प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ।।~ हृदय में स्थित प्राण अपने स्थान में सात - सात स्थापित है।

47= ब्रह्मैवेदमृत पुरस्तात् । । ~ यह अमृत ब्रह्म ही अग्रणी है । ।

48= ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति ।।~ ब्रह्म का जानकार ब्रह्म ही होता है । ।

49= यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति ।।~ जैसे पृथ्वी में औषधियाँ उत्पन्न होती हैं ।

50= यद्भूत योनि परिपश्यन्ति धीराः ॥~ जो सम्पूर्ण भूतों का कारण है , उसे विवेकशील लोग सब ओर देखते है। 

51= पुण्य पापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति । । ~ विद्वान पुरुष पुण्य एवं पाप दोनों का परित्याग कर निर्मलचित्त होकर ब्रह्म के परमसाम्य को प्राप्त हो जाता है।

52= न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ ~ वहाँ उस आत्मस्वरूप ब्रह्म में न तो सूर्य प्रकाशमान होता है , न चन्द्रमा और तारे ही प्रकाशित होते हैं । वहाँ यह बिजली भी प्रकाशित नहीं होती , फिर यह लगातार दृष्टि में आनेवाली अग्नि किस गिनती में है ? उसके प्रकाशित होने से ही यह सब कुछ प्रकाशित होता है ।

 53= पुरुष एवेदं विश्वं कर्म ॥ ~ यह समाप्त कर्म एवं प्रपञ्च पुरुष ही है ।

54= परात्परं पुरुष मुपैति दिव्यम् ॥ ~ परात्पर दिव्यपुरुष को प्राप्त हो जाता है ।

55= ‘श्रेयान् स्वधर्मो विगुण:’—(१८। ४७) ~ स्वधर्मका नाम स्वकर्म है। 

56= स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह: ॥ (गीता ३। ३५) ~कष्टोंकी सीमा मृत्यु है और स्वधर्म-पालनमें यदि मृत्यु भी होती हो तो वह भी परिणाममें कल्याणकारक है।

 57= यज्ञयाचरत: कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥ (४/२३) ~ यज्ञके लिये आचरित सम्पूर्ण कर्म सर्वथा विलीन हो जाते हैं। अर्थात् वे शुभाशुभ फलका उत्पादन नहीं करते, फलदायक—बन्धनकारक नहीं होते, जन्म देनेवाले नहीं होते।

 58=‘एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे।’ ~इन सबको तू कर्मोंसे उत्पन्न जान।

 59= ‘‘योग: कर्मसु कौशलम्’—‘कर्मोंमें योग ही ‘कुशलता’ है।’ 

60= समत्वं योग उच्यते’ ~समताको ही योग कहा जाता है।’ यह समता

 61=‘सङ्गं त्यक्त्वा’ और ‘सिद्ध्यसिद्ध्यो: समे भूत्वा' से प्राप्त होती है। आसक्तिका त्याग और सिद्धि- असिद्धिमें सम हो जाने से समता आती है। समताका नाम ही योग है और योग ही कर्म में कुशलता है।

62=" मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । " (गीता ९/३४) ~‘मुझमें मन लगा, मेरा ही भजन कर, मेरा पूजन कर और मुझे ही नमस्कार कर।’ भगवान् कहते हैं—‘तू अपना सब कुछ मेरे अर्पण कर दे तो तेरा कल्याण हो जाय और मेरा काम बन जाय।’ 

63= भगवान् अर्जुन से कहते हैं— ‘इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।’ (गीता १८/६४) ~‘तू मेरा इष्ट है........।’ जीव भगवान्को इष्ट मानता है। भगवान् कहते हैं—‘तू मेरा इष्ट है।’ तात्पर्य है कि जो भगवान्को अपना मन सौंप देता है, उसे भगवान् अपना इष्ट मान लेते हैं, उसका आज्ञापालन करते है।

64= ‘यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:।’

 65= ‘नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण:।’ ~नियत कर्म कर और न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है।

 66=‘अकर्मण: ते शरीरयात्रापि न प्रसिद्ध्येत्।’ ~'कुछ नहीं करेगा तो तेरा निर्वाह भी नहीं होगा, जीवन भी नहीं चलेगा। कर्म करनेसे ही जीवन-निर्वाह होगा।’ 

67= ‘कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते।’ ~शास्त्रोंमें कहा है कि कर्मों से जन्तु बँधता है। वस्तुतः जन्तु (जानवर) ही बन्धनमें आते हैं, मनुष्य नहीं। मनुष्य बँधता है सकाम कर्म करके, स्वार्थबुद्धिसे। 

68=‘अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तव:।’ ~जो स्वार्थबुद्धिसे प्रेरित होकर मोहमें फँसे हुए हैं, वे मनुष्य थोड़े ही हैं, वे तो जन्तु हैं—भले ही उनकी आकृति मनुष्यकी-सी ही हो।

 69=‘यद् यद्धि कुरुते जन्तुस्तत् तत् कामस्य चेष्टितम्।’ ~जानवरकी सारी चेष्टाएँ कामयुक्त—स्वार्थप्रेरित होती हैं। कामनासे ही कर्म बन्धनकारक होता है।

70= 'यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन: ।' ~जो कर्म परमात्माकी प्रसन्नताके लिये, लोकसंग्रहके लिये, सब लोगोंके उद्धारके लिये, आसक्ति, स्वार्थ और कामनाको त्यागकर किया जाता है, वह बाँधता नहीं है। यही है ‘यज्ञ’। (यहाँ ‘यज्ञ’का व्यापक अर्थ—‘कर्तव्यकर्म’ है।)

 71= इसके अगले श्लोकमें भगवान् कहते हैं— ‘सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति:।’ ~सृष्टिके आदिमें प्रजापति ब्रह्माने यज्ञोंके साथ प्रजाओंको उत्पन्न किया। (यहाँ ‘प्रजा:’ शब्दके अन्तर्गत ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—सभी आ जाते हैं।)

 72=सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति: । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ इसी कर्तव्य-कर्मरूप यज्ञके साथ प्रजाकी सृष्टि करके प्रजापतिने कहा—इसके द्वारा तुम सबकी वृद्धि करो और यही तुम्हारी इष्ट कामनाकी पूर्ति करनेवाला हो, परंतु साथ ही 

73= भगवान् कहते हैं—‘इष्टकामनाके साथ अपना सम्बन्ध मत जोड़ो। तुम यज्ञके द्वारा देवताओंका पूजन करो। देवताओंका तुम पूजन करो, पर देवताओंसे कुछ चाहो मत।

74=अपने कर्तव्यका पालन करो; परंतु लोकहितके लिये। उससे अपने स्वार्थका सम्बन्ध मत जोड़ो। 

75=गीता (२.४५) में भगवान् अर्जुनको ‘निर्योगक्षेम आत्मवान्’ बननेको कहते हैं और 

76=(९.२२) में भगवान कहते हैं— ‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ ‘तुम्हारे योगक्षेमका वहन मैं करूँगा, तू उसकी चिन्ता छोड़ दे।’ 

77= अग्रौ प्रास्ताहुति: सम्यगादित्यमुपतिष्ठते । आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं तत: प्रजा: ॥ ~अग्रिमें दी हुई आहुति सूर्यनारायणकी किरणोंको पुष्टि पहुँचाती है और वे किरणें पुष्ट होकर जल खींचती हैं तथा वह जल मेघ बनकर बरसता है। उस वर्षासे जगत्की तृप्ति होती है। शुभ कर्म करनेसे देवताओंकी संतुष्टि होती है। 

78= अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भव: । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञ: कर्मसमुद्भव: ॥ ~प्राणी जितने भी पैदा होते हैं, वे अन्नसे होते हैं। अन्न होता है पर्जन्यसे—वर्षासे और वर्षा यज्ञसे होती है।


।।प्रथमेनार्जिता विद्या द्वितीयेनार्जितं धनं।तृतीयेनार्जितः कीर्तिः चतुर्थे किं करिष्यति।।

अर्थ : जिसने प्रथम अर्थात ब्रह्मचर्य आश्रम में विद्या अर्जित नहीं की, द्वितीय अर्थात गृहस्थ आश्रम में धन अर्जित नहीं किया, तृतीय अर्थात वानप्रस्थ आश्रम में कीर्ति अर्जित नहीं की, वह चतुर्थ अर्थात संन्यास आश्रम में क्या करेगा?


।।येषां न विद्या न तपो न दानं, ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्म:। ते मृत्युलोके भुवि भारभूता, मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति।। -उपनिषद

अर्थ : जिसके पास विद्या, तप, ज्ञान, शील, गुण और धर्म में से कुछ नहीं, वह मनुष्य ऐसा जीवन व्यतीत करते हैं जैसे एक मृग। अर्थात जिस मनुष्य ने किसी भी प्रकार से विद्या अध्ययन नहीं किया, न ही उसने व्रत और तप किया, थोड़ा बहुत अन्न-वस्त्र-धन या विद्या दान नहीं दिया, न उसमें किसी भी प्रकार का ज्ञान है, न शील है, न गुण है और न धर्म है, ऐसे मनुष्य इस धरती पर भार होते हैं। मनुष्य रूप में होते हुए भी पशु के समान जीवन व्यतीत करते हैं।

 ।।शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।। -उपनिषद  

 अर्थ : शरीर ही सभी धर्मों (कर्तव्यों) को पूरा करने का साधन है। अर्थात शरीर को सेहतमंद बनाए रखना जरूरी है। इसी के होने से सभी का होना है अत: शरीर की रक्षा और उसे निरोगी रखना मनुष्य का सर्वप्रथम कर्तव्य है। पहला सुख निरोगी काया।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ -वृहदारण्यक उपनिषद

अर्थ : अर्थात वह सच्चिदानंदघन परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा सभी प्रकार से सदा सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत भी उस परब्रह्म से पूर्ण ही है, क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत पूर्ण होने पर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है। उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है।


किसी उपनिषद का सम्बन्ध किस वेद से है, इस आधार पर उपनिषदों को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:

    ऋग्वेदीय — 10 उपनिषद्

    शुक्ल यजुर्वेदीय — 19 उपनिषद्

    कृष्ण यजुर्वेदीय — 32 उपनिषद्

    सामवेदीय — 16 उपनिषद्

    अथर्ववेदीय — 31 उपनिषद्