भगवान शिव कौन हैं? Who is Lord shiva?
ॐ नमः शिवाय।। हर हर महादेव🙏🙏
हिन्दू धर्म में भगवान शिव को महादेव (देवों के देव) कहा जाता है। वह त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) में संसार के संहारकर्ता या पुनरुत्पादक माने गए हैं। शिव का अर्थ 'कल्याणकारी' होता है। उन्हें निराकार परमेश्वर (सदाशिव) और साकार रूप (भोलेनाथ/शंकर) दोनों रूपों में पूजा जाता है। शिव को योग, ध्यान और कला का प्रथम गुरु (आदियोगी) माना जाता है। उन्हें आमतौर पर शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है, जो ब्रह्मांड और सृजन का प्रतीक है।उनके स्वरूप में मस्तक पर तीसरा नेत्र, गले में सर्प, जटाओं से बहने वाली गंगा, हाथ में त्रिशूल व डमरू और शरीर पर भस्म सुशोभित है।
परमात्मा सृष्टि का निर्माण करते है उसे गति देते हैं उसके पोषण विकास करते हैं और जब बुराइयां बहुत बढ़ जाती हैं तो सब कुछ नष्ट भी कर देते हैं ।
परमात्मा की सृजन या निर्माण करने वाले शक्ति का नाम ब्रह्मा है । पालन पोषण और सब कुछ व्यवस्थित ढंग से संचालन का कार्य उसी परमात्मा की दूसरी शक्ति विष्णु करते हैं। और परमात्मा की तीसरी शक्ति जो आवश्यकता होने पर सब कुछ नष्ट भी कर देती है । वह शिव कहलाती है।
महाकाल हैं, सर्वव्यापी हैं, सर्वग्राही हैं। सिर्फ भक्तों के नहीं देवताओं के भी संकटमोचक हैं। शिव का पक्ष सत्य का पक्ष है, उनके निर्णय लोकमंगल के हित में होते हैं। जीवन के परम रहस्य को जानने के लिए शिव के इन रूपों को समझना जरूरी होगा, क्योंकि शिव उस आम आदमी की पहुंच में हैं, जिसके पास मात्र एक लोटा जल है। इसीलिए उत्तर में कैलास से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम तक उनकी व्याप्ति और श्रद्धा एक सी है।
शिव को निराकार रूपम (किसी भी आकार या आकार के बिना) के रूप में भी वर्णित किया जाता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि उप-परमाणु स्तर पर कोई द्रव्यमान नहीं होता है, लेकिन केवल ऊर्जा (जिसे हम शक्ति कहते हैं) और उप-परमाणु कण लगातार शून्य (विनाश) में गायब हो जाते हैं और कुछ भी नहीं (निर्माण) से फिर से प्रकट होते हैं।
आध्यात्मिक गुरुओं के अनुभवों के अनुसार, इस ब्रह्मांड की सभी चीजें एक ही ऊर्जा (शक्ति) की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं।
ब्रह्मांड के निर्माण से पहले केवल विशाल शून्यता (श्योना, शिव या शून्यता) थी, फिर ऊर्जा (शक्ति) शून्य से प्रकट हुई और पूरे ब्रह्मांड को ऊर्जा की अभिव्यक्ति के रूप में बनाया गया (कुछ भी नहीं की मदद से) और यह प्रक्रिया हर पल हो रही है ।
अगर आप डार्क मैटर, डार्क एनर्जी, हिग्स बोसोन और गॉड पार्टिकल के बारे में रिसर्च करेंगे, तो आपको महसूस होगा कि पूरा ब्रह्मांड ऊर्जा का प्रकटीकरण है
संस्कृत में 'शिव' का अर्थ 'परम कल्याणकारी' और 'लिंग' का अर्थ 'प्रतीक, चिह्न या निशान' होता है। इस प्रकार, शिवलिंग का असली अर्थ भगवान शिव का निराकार और अनंत प्रतीक है, जिसका न कोई आदि है और न कोई अंत। यह किसी शारीरिक अंग का नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड की सृजन शक्ति का द्योतक है।
शिवलिंग का अर्थ लिंग या योनी नहीं होता Meaning of Shivling...
शिवलिंग का वास्तविक अर्थ क्या है और कैसे इसका गलत अर्थ निकालकर हिन्दुओं को भ्रमित किया…??
संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है । इसे देववाणी भी कहा जाता है।जैसा कि हम सभी जानते हैं कि एक ही शब्द के विभिन्न भाषाओँ में अलग-अलग अर्थ निकलते हैं ।
लिंग का अर्थ संस्कृत में चिन्ह, प्रतीक होता है जबकी जनर्नेद्रीय को संस्कृत मे शिश्न कहा जाता है।
शिवलिंग का अर्थ हुआ शिव का प्रतीक, पुरुषलिंग का अर्थ हुआ पुरुष का प्रतीक इसी प्रकार स्त्रीलिंग का अर्थ हुआ स्त्री का प्रतीक और नपुंसकलिंग का अर्थ हुआ नपुंसक का प्रतीक।
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि एक ही शब्द के विभिन्न भाषाओँ में अलग-अलग अर्थ निकलते हैं ।
उदाहरण के लिए यदि हम हिंदी के एक शब्द “सूत्र” को ही ले लें तो सूत्र का मतलब डोरी/धागा
कोई भाष्य अथवा लेखन भी हो सकता है। जैसे कि नासदीय सूत्र ब्रह्म सूत्र इत्यादि ।
सूत्र को अंग्रेजी में Formula (गणित या विज्ञान में) कहते हैं।
सूत्र, किसी बड़ी बात को अतिसंक्षिप्त रूप में अभिव्यक्त करने का तरीका है। इसका उपयोग व्याकरण, गणित, विज्ञान आदि में होता है।
Meaning of Shivling
ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे हैं |
ऊर्जा और प्रदार्थ। हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है। इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते हैं।
ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा ऊर्जा शिवलिंग में निहित है। वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है
शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-आनादी एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतिक भी है। अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों सामान हैं।
योनी शब्द का अर्थ
मनुष्ययोनि ”पशुयोनी”पेड़-पौधों की योनी’जीव-जंतु योनि
योनि का संस्कृत में प्रादुर्भाव ,प्रकटीकरण अर्थ होता है….जीव अपने कर्म के अनुसार विभिन्न योनियों में जन्म लेता है। किन्तु कुछ धर्मों में पुर्जन्म की मान्यता नहीं है नासमझ बेचारे। इसीलिए योनि शब्द के संस्कृत अर्थ को नहीं जानते हैं। जबकी हिंदू धर्म मे 84 लाख योनि बताई जाती है।यानी 84 लाख प्रकार के जन्म हैं।

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