अलग-अलग धर्मों, दर्शनों और संस्कृतियों में ईश्वर या भगवान की परिभाषाएं अलग-अलग हैं। भारतीय दर्शन और सनातन परंपरा के अनुसार, वास्तव में भगवान एक निराकार, सर्वव्यापी और अनंत ऊर्जा हैं, जिसे 'ब्रह्म' कहा गया है।
ईश्वर सृष्टि का निर्माण, संचालन और विलय करने वाली सर्वोच्च और निराकार ऊर्जा है। ईश्वर का निवास किसी विशेष स्थान में नहीं, बल्कि इस ब्रह्मांड के कण-कण और सभी प्राणियों के हृदय में (अंतर्यामी) है।
Real God (सच्चा भगवान) कौन है, इसका कोई एक उत्तर नहीं है क्योंकि यह पूरी तरह से व्यक्तिगत आस्था, धर्म और दर्शन पर निर्भर करता है । सभी धर्मों और समुदायों के अनुसार ईश्वर की अलग-अलग व्याख्याएँ हैं :
सनातन धर्म (हिंदू धर्म): यहाँ कई देवी-देवता हैं , लेकिन सर्वोच्च शक्ति ब्रह्म (निराकार) को माना गया है, और विभिन्न देवी-देवता उसी एक परम शक्ति के अलग-अलग रूप हैं ।
इस्लाम: इस्लाम धर्म में अल्लाह को ही एकमात्र और सच्चा ईश्वर माना गया है, जो सर्वशक्तिमान और सृष्टिकर्ता हैं ।
ईसाई धर्म: इसमें ईश्वर को त्रिमूर्ति (Trinity) माना गया है - पिता (परमेश्वर), पुत्र (ईसा मसीह), और पवित्र आत्मा ।
सिख धर्म: वाहेगुरु (ओंकार) को एकमात्र सत्य और निराकार ईश्वर माना गया है ।
इस संसार में जितने भी अवतार हुए हैं और जिस संप्रदाय, जाति में हुए हैं, सब मनुष्य रूप में हुए हैं, वह सब हमको इस संसार में सही मार्ग पर चलने के लिए समझाने आये थे।इस संसार को कोई एक ही शक्ति चला रही है, और इस संसार का मालिक भी एक ही है, और यदि हम सब अपना अपना ईश्वर अलग - अलग मानते हैं तो यह हमारी सबसे बड़ी भूल है ।
ऋग्वेद में बहुत स्पष्ट रूप से कहा गया है— 'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति'। इसका अर्थ है कि सत्य (ईश्वर) एक ही है, लेकिन ज्ञानी लोग उसे अलग-अलग नामों और रूपों से पुकारते हैं।
विश्व के सभी अलग अलग धर्मावलंबियों में इस बात की प्रतिस्पर्धा बनी हुई है कि हमारा ईश्वर ही सर्वश्रेष्ठ है। सभी की पूजा पद्धतियाँ अलग हो सकतीं हैं और मान्यताएँ भी। मेरा मानना है कि किसी भी धर्मग्रंथों में लिखी हुई बातें तत्कालीन परिस्थितियों को दर्शाती है न कि आज के समयानुसार। ईश्वर कौन है, कैसा है और क्या चाहता है ये कोई नहीं जानता और अगर कोई दावा करता है कि वो ईश्वर को जानता है तो वो सामने वाले को बेवकूफ बना रहा होता है। सभी धर्म तो हम मानव मष्तिष्क की उपज है।
एक अनंत निराकार शक्ति तो है जो हर चीज के लिए कारक है। अब चाहे उसे भगवान, अल्लाह, जीसस कुछ भी कह लो लेकिन एक बात तो सत्य है जिस ईश्वर को हम जानते हैं वो सब मानव द्वारा निर्मित हैं वो मानव की कल्पना है।
इंसान ने अपने लिए पहिया बनाया।इंसान ने अपने लिए कपड़े बनाए।इंसान ने अपने लिए पैसे बनाए।इंसान ने अपने लिए हथियार बनाए।इंसान ने अपने लिए मूर्तियाँ बनाईं।इंसान ने अपने लिए भाषा बनाईं।इंसान ने अपने लिए लिपि बनाईं।इंसान ने अपने लिए कागज बनाए।इंसान ने अपने लिए धर्म बनाए।और इंसान ने ईश्वर की अनेक कल्पनाएँ भी गढ़ीं।इंसान ने अपनी समझ, विवेकबुद्धि का उपयोग करके यह सब किया।
जब कोई विचार मनुष्य की स्वतंत्र सोच, तर्क और वैज्ञानिक दृष्टि को रोक दे, तब वह आस्था नहीं, अंधविश्वास बन जाता है।ईश्वर के नाम पर यदि भय, पाखंड, भेदभाव, शोषण और मानसिक गुलामी फैलाई जाए, तो प्रश्न पूछना आवश्यक है।
"भगवान ने प्रकृति की रचना की। प्रकृति से प्राप्त संसाधनों का उपयोग करके मनुष्य ने विज्ञान, तकनीक और जीवन के विभिन्न साधनों का निर्माण किया। और स्वयं मनुष्य भी ईश्वर की ही सृष्टि है। इसलिए मनुष्य की रचनात्मक क्षमता भी अंततः उसी ईश्वर द्वारा प्रदत्त बुद्धि और प्रकृति की देन मानी जा सकती है।"
यदि इसे धार्मिक दृष्टि से देखें, तो यह विचार कई परंपराओं में मिलता है कि ईश्वर ने मनुष्य को बुद्धि, विवेक और सृजन की क्षमता दी है, जबकि प्रकृति ने उसे आवश्यक संसाधन दिए। मनुष्य उन संसाधनों को नए रूप में ढालता है; वह प्रकृति के नियमों का उपयोग करता है, उन्हें शून्य से उत्पन्न नहीं करता।
इसलिए यह कहना उचित होगा कि प्रकृति मूल आधार है, मनुष्य उसका सृजनात्मक उपयोगकर्ता है, और आस्था के अनुसार दोनों का मूल स्रोत ईश्वर हैं।
सृष्टि का कण-कण जिसका है, जिससे यह संसार बना है, जो जीवन का आधार स्वयं, जिससे हर प्राणी खड़ा है। वही अन्नदाता जगत का, वही पालनहार महान, वही सूर्य की पहली किरण, वही चंद्रमा की मुस्कान। वही निराकार, वही साकार, वही शक्ति, वही भगवान, जिस भाव से उसको पुकारो, देता है वह वैसा ही ज्ञान। मंदिर में भी वही विराजे, मस्जिद में भी उसका नूर, गुरुद्वारे की वाणी में वही, वही चर्च का पावन सुर। धरती, अम्बर, जल और वायु, सबमें उसका ही विस्तार, कण-कण में उसकी उपस्थिति, वही जग का सच्चा आधार। जब-जब धर्म डगमगाता है, जब बढ़ता अन्याय अपार, तब लोक-कल्याण हेतु प्रभु, लेते हैं दिव्य अवतार। कोई राम कहकर बुलाता, कोई कृष्ण नाम पुकारे, कोई ईश्वर, कोई परमात्मा, कोई प्रेम से उसे निहारे। नाम अनेक, स्वरूप अनेक, पर सत्य सदा एक ही है, जिस भाव से तुम उसे खोजो, वह तुम्हारे निकट वहीं है। प्रेम, दया और सत्य जहाँ है, वहीं उसका पावन धाम, सारे जग का एक सहारा, एक ही शक्ति, एक ही नाम। आप ही जग के पालनहार, आप ही परम कारण। आपसे ही जीवन का प्रकाश, आपसे ही संसार, आप ही आदि, आप ही अनंत, आप ही सबके आधार।॥
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